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Articles - भारत छोड़ो आंदोलन


अगस्त १९४२ का दौर था जब स्वतंत्रता संग्राम अपनी चरम सीमा पर पहुँच चुका था| भारत छोड़ो आंदोलन देश की स्वतंत्रता का अंतिम आंदोलन बना| अगस्त २०१७ में उस आंदोलन के ७५ साल हो गए हैं| देश के विभिन्न जगहों पर इस अवसर को मनाया जा रहा है| इस विशेष अवसर भारत छोड़ो आंदोलन का ऐतिहासिक संदर्भ व गॉंधीजी के विचार को प्रस्तुत करता यह लेख हमारे पाठकों के लिए प्रस्तुत कर रहे हैं|   - संपादक

९ अगस्त २०१७ को भारत छोड़ो आंदोलन के पूरे ७५ साल हो गये हैं| यह आंदोलन एक ऐसा आंदोलन था, जिसने ब्रिटिश हुकूमत को हिलाकर रख दिया था| गॉंधीजी के नेतृत्व में शुरू हुआ यह आंदोलन बहुत ही सोची-समझी रणनीति का हिस्सा था, इसमें पूरा देश शामिल हुआ| इस आंदोलन का तत्कालीन ब्रिटिश सरकार पर बहुत ज्यादा असर हुआ| यह भारत की आजादी में सबसे महत्त्वपूर्ण आंदोलन था| दूसरे विश्व युद्ध में उलझे इंग्लैंड को भारत में ऐसे आंदोलन की उम्मीद भी नहीं थी|

आंदोलन का इतिहास

६ अगस्त १९२५ को ब्रिटिश सरकार का तख्ता पलटने के उद्देश्य से ‘बिस्मिल’ के नेतृत्व में हिन्दुस्तान प्रजातंत्र संघ के दस जुझारू कार्यकर्ताओं ने काकोरी कांड किया था, जिसकी याद ताजा रखने के लिए पूरे देश में हर साल ९ अगस्त को काकोरी कांड स्मृति-दिवस मनाने की परंपरा भगत सिंह ने प्रारंभ कर दी थी और इस दिन बहुत बड़ी संख्या में नौजवान एकत्र होते थे| इसी वजह से भारत छोड़ो आंदोलन के लिए गॉंधीजी ने ९ अगस्त १९४२ का दिन चुना था|

अंग्रेजी हुकूमत दूसरे विश्व युद्ध में पहले ही पस्त हो चुकी थी और जनता की चेतना भी आंदोलन की ओर झुक रही थी| लिहाजा ८ अगस्त, १९४२ को पारित ‘भारत छोड़ो’ संकल्प से भारत के स्वतंत्रता संग्राम में एक निर्णायक मोड़ की शुरुआत हुई| गॉंधीजी को लगा कि सत्य और अहिंसा के आदर्श की अग्निपरीक्षा की घड़ी आ गयी है| विश्‍व युद्ध का दौर था, भारत पर कठोर साम्राज्यवादी शासन की तानाशाही जारी थी| धुरी राष्ट्रों से हमारी मातृभूमि पर हमले की धमकियां मिल रही थीं| ऐसे माहौल में स्वतंत्रता सेनानी एक ऐसी मानवीय रणनीति बनाने में लगे थे जिसमें हत्याओं, विनाश और विश्‍वासघात की कोई जगह न हो|

दूसरे महायुद्ध का आग़ाज होने के बाद पराधीन भारत को ब्रिटिश सरकार ने स्वतः ही युद्ध में घसीट लिया था| कांग्रेस के नेताओं ने भारत को पूर्णतः आज़ाद कर देने के लिए ब्रिटेन के तत्कालीन प्रधानमंत्री चर्चिल तथा ब्रिटिश हुकूमत से गुज़ारिश की| कांग्रेस की पुकार को ब्रिटिश शासकों ने एकदम अनसुना कर दिया| महज दिखावे के तौर पर क्रिप्स मिशन को भारत भेज दिया| जिसने महायुद्ध की समाप्ति के पश्चात् भारत को आजादी देने की बात पेश की| इस पेशकश को कांग्रेस ने एकदम खारिज कर दिया| महात्मा गॉंधी ने साफ साफ शब्दों में क्रिप्स महोदय से कहा कि ‘जब आपके पास बस इतनी सी बात है तो अच्छा है कि जो सबसे पहला हवाई जहाज आपको मिले आप उससे ही लंदन वापिस लौट जाए|’

गॉंधीजी के विचार

क्रिप्स मिशन के बाद स्थिति इतनी तेजी से बिगड़ रही थी कि गॉंधीजी ने विदेशी ताकतों के खिलाफ सत्याग्रह आंदोलन छेड़ने का ऐलान कर दिया, हालांकि ऐसा करने में कुछ लोगों के सत्याग्रह के मार्ग से भटकने की आशंका भी बनी हुई थी| गोवालिया टैंक मैदान में भारत छोड़ो प्रस्ताव पर अपने दृढ़ भाषण में गॉंधीजी द्वारा ‘करेंगे या मरेंगे’ का उद्घोष दिया गया| अपने भाषण में उन्होंने कहा कि अहिंसा की दृष्टि से ‘भारत छोड़ोे’ प्रस्ताव आत्मा की सबल और स्वस्थ पुकार है| इसका अर्थ है अहिंसा और सत्य के शुद्ध उपायों द्वारा विदेशी शासन और अधिकार की समाप्ति करना| हर व्यक्ति को इस बात की खुली छूट है कि वह अहिंसा पर आचरण करते हुए अपना पूरा जोर लगाए| हड़तालों और दूसरे अहिंसात्मक तरीकों से पूरा गतिरोध पैदा कर दीजिए| सत्याग्रहियों को मरने के लिए, न कि जीवित रहने के लिए, घरों से निकलना होगा| उन्हें मौत की तलाश में फिरना चाहिए और मौत का सामना करना चाहिए| जब लोग मरने के लिए घर से निकलेंगे केवल तभी कौम बचेगी| ...सत्याग्रही अपनी जान दे देगा किन्तु अपने ऊपर लिये काम को कभी न छोड़ेगा| ‘करेंगे या मरेंगे’ का यही अर्थ है|

८ अगस्त १९४२ को कांग्रेस महासमिति के समक्ष भारत छोड़ो आंदोलन के प्रस्ताव पर बोलते हुए महात्मा गॉंधी ने उपरोक्त शब्द कहे थे, जो कि इतिहास का अहम दस्तावेज बन गए| महात्मा गॉंधी इस अवसर पर हिंदी और अंग्रेजी में तकरीबन तीन घटें तक बोले| महात्मा की प्रस्तुति का पूरे समय तक अजब सन्नाटा छाया रहा| ऐसा प्रतीत हो रहा था कि उनका एक-एक शब्द देश की मर्मान्तक चेतना को झिंझोड़ता रहा और उसे उद्विग्न करता रहा|

९ अगस्त १९४२ का दिन निकलने से पहले ही कांग्रेस वर्किंग कमेटी के सभी सदस्यों को गिरफ्तार कर लिया गया था| गॉंधीजी के साथ भारत कोकिला सरोजिनी नायडू को पुणे के आगा खान पैलेस में,

डॉ. राजेंद्र प्रसाद को पटना जेल व अन्य सभी सदस्यों को अहमदनगर के किले में नजरबंद किया गया था| आंदोलन की कमान कांग्रेस के कनिष्ठ नेताओं ने संभाल ली| देश के आम जनमानस ने अत्यंत विशाल पैमाने पर आंदोलन में सक्रिय शिरकत की| अरुणा आसफअली, अच्युतराव पटवर्धन, जयप्रकाश नारायण, राममनोहर लोहिया, उषा मेहता, यूसूफ मेहर अली सरीखे कांग्रेस नेता आंदोलन के क्षितिज पर उभरे और एक ऐसा विलक्षण संग्राम हुआ कि ब्रिटिश राज की नींव हिल गई|

देखा जाए तो यह सही मायने में एक जन आंदोलन था, जिसमें लाखों आम हिंदुस्तानी चाहे वह गरीब हो, अमीर हो, ग्रामीण हो सभी लोग शामिल थे| इस आंदोलन की सबसे बड़ी खास बात यह थी कि इसने युवाओं को बड़ी संख्या में अपनी ओर आकर्षित किया| युवा कॉलेज छोड़कर जेल की कैद स्वीकार कर रहे थे| सबसे बड़ी बात यह थी कि इस आंदोलन का प्रभाव ही इतना ज्यादा था कि अंग्रेज हुकूमत पूरी तरह हिल गई और उसे इस आंदोलन को दबाने के लिए ही साल भर से ज्यादा का समय लगा|

‘भारत छोड़ो’ आंदोलन भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और महात्मा गॉंधी के संघर्ष का एक ऐसा क्रांतिकारी काल रहा, जिसमें अंग्रेजी राज के विरुद्ध भारत के जनमानस को निर्णायक संग्राम के लिए ललकारा गया| महात्मा गॉंधी की ललकार पर लाखों भारतवासी ‘करेंगे या मरेंगे’ के मंत्र पर अपने जीवन को जंग-ए-आजादी के लिए आहूत करने के लिए अपने घरों से निकल पड़े थे|

महात्मा गॉंधी की सबसे महान कामयाबी यह रही कि उन्होंने कांग्रेस के आंदोलन को केवल पढ़े-लिखे लोगों के सीमित दायरे से बाहर निकाल कर भारत के विशाल जनमानस से जोड़ दिया| देश के देहात के करोड़ों किसान मजदूरों को हिला दिया और उनकी चेतना को आजा़दी के संग्राम के साथ संबद्ध कर दिखाया| यही कारण रहा कि ‘भारत छोड़ो’ आंदोलन में सक्रिय तौर पर भागीदारी करनेवालों में ग्रामीण इलाकों के साठ फीसदी से अधिक लोग रहे| आजादी के आंदोलन के इतिहास में १९४२ का ‘भारत छोड़ो’ आंदोलन सबसे अधिक ताकतवर गरिमामय और ज्योतिर्मय अध्याय बना|

महात्मा गॉंधी का भारतीय जनमानस पर किस कदर असर रहा इस बात को दर्शाने के लिए कविवर सोहनलाल द्विवेदी ने कहा था...

चल पड़े जिधर दो डगमग पग चल पड़े कोटि पग उसी ओर
पड़ गई जिधर भी एक दृष्टि गड़ गए कोटि दृग उसी ओर
जिस सिर पर निज धरा हाथ उसके सिर के रक्षक कोटि हाथ
जिस पर निज मस्तक झुका दिया झुक गए उसी पर कोटि माथ

सन् १९४२ में देश में आज़ादी के लिए एक नई चेतना का उदय हुआ| जिसका पूरा श्रेय महात्मा गॉंधी और कांग्रेस को दिया जाना चाहिए| महात्मा गॉंधी का स्पष्ट कहना था कि अंग्रेजों को भारत की धरती पर एक मिनट के लिए भी बने रहने का कोई हक नहीं है| उन्हीं दिनों अमेरिका के प्रख्यात पत्रकार लुई फिशर भारत आए और जून १९४२ में गॉंधीजी के साथ सेवाग्राम में रहे| लुई फिशर ने बड़ी ईमानदारी के साथ १९४२ की घटनाओं का विश्लेषण किया| गॉंधीजी ने फिशर से कहा था कि महायुद्ध के बाद स्वाधीनता में उनकी कोई दिलचस्पी नहीं| वह अभी स्वाधीनता चाहते हैं| दूसरे महायुद्ध के दौरान जब समूची दुनियां में हिंसा का तांडव हो रहा था और भारत में महात्मा अपना अहिंसक संग्राम का बिगुल बजा चुके थे|

‘भारत छोड़ो’ आंदोलन में करेंगे या मरेंगे का नारा लगाते हुए दस हजार से अधिक भारतवासी शहीद हुए| एक लाख से अधिक आंदोलनकारी ब्रिटिश पुलिस द्वारा गिरफ्तार कर लिए गए| अनेक स्थानों पर ब्रिटिश शासन को पूरी तरह से ध्वस्त कर दिया गया| भारत के गॉंव गॉंव में यह आंदोलन फैल गया था| बलिया, मुंगेर, मुजफ्फरपुर, सतारा, कोल्हापुर, तालचर, तामलुक, मुर्शिदाबाद आदि उनके जिलों पर आंदोलनकारियों का कब्जा हो गया| जबरदस्त ब्रिटिश दमन के कारण आंदोलन भयावह रूप से हिंसक हो उठा था| आंदोलनकारियों ने रेल पटरियां उखाड़ फेंकी, टेलीफोन के तारों को तहस नहस कर दिया और बहुत सारे डाकखानों को ध्वस्त कर डाला| विशाल पैमाने पर समूचे देश में शासकीय संपत्ति को भारी नुकसान पहुँचाया|

गॉंधीजी ने कहा था, कि २९ अगस्त के बाद की घटनाओं पर मुझे बहुत खेद है| किंतु ब्रिटिश सरकार ने ही जनता को भड़का कर पागलपन की सीमा तक पहुँचा दिया| मैंने जीवन भर अहिंसा के लिए प्रयत्न किया फिर भी अंग्रेज शासक मुझ पर हिंसा का इल्जाम लगा रही हैं| इसलिए मेरे दर्द को कोई मरहम नहीं मिल सकता| मैं एक सत्याग्रही के नियम का पालन करूंगा अर्थात् अपनी शक्ति के अनुसार उपवास करूंगा जो कि

९ फरवरी को प्रारम्भ होगा और इक्कीस दिनों के बाद खत्म होगा| प्रख्यात लेखक रामवृक्ष बेनपुरी ने अपनी पुस्तक ‘जंजीरे और दीवारें’ में सन् १९४२ के आंदोलन का अत्यंत सजीव चित्रण किया| उन्होंने लिखा कि एक अजब समां पूरे देश में पैदा हो गया| हर शख़्स नेता बन गया और देश का प्रत्येक चौराहा ‘करेंगे या मरेंगे’ आंदोलन का दफ्तर बन गया| देश ने स्वयं को क्रांति के हवन कुंड में झोंक दिया| क्रांति की ज्वाला देश भर में धू-धू कर जल रही थी| बम्बई ने रास्ता दिखा दिया| अवागमन के सारे साधन ठप हो चुके थे| थानों पर कब्जा किया जा रहा था| कचहरियांँ विरान हो चली थीं| भारत के लोगों की वीरता और ब्रिटिश सरकार की नृशंसता की खबरें आ रही थीं| जनता ने करेंगे या मरेंगे के गॉंधीवादी मंत्र को अच्छी तरह से दिल में बैठा लिया|

सन् १८५७ के पश्चात् देश की आजादी के लिए चलाए जाने वाले सभी आंदोलनों में ‘भारत छोड़ो’ आंदोलन सबसे विशाल और सबसे तीव्र आंदोलन साबित हुआ| जिसके कारण भारत में ब्रिटिश राज की नींव पूरी तरह से हिल गई थी| आंदोलन का ऐलान करते वक्त गॉंधीजी ने कहा था मैंने कांग्रेस को बाजी पर लगा दिया| वह कामयाब होगी अथवा मर मिटेगी| यह जो लड़ाई छिड़ रही है वह एक सामूहिक लड़ाई है| ‘भारत छोड़ो’ आंदोलन भारत के इतिहास में अगस्त क्रांति के नाम से भी जाना जाता रहा| भारतीय जनमानस की विशाल पैमाने पर भागीदारी के कारण यह आंदोलन वस्तुतः क्रांति में ही तबदील हो गया| अगस्त क्रांति के शहीदों के बलिदान व्यर्थ नहीं गए| आंदोलन अपने मक़सद को हासिल करने में कारगर सिद्ध हुआ|

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