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Articles - सत्याग्रह की फलश्रृति चम्पारण की गाथा

चम्पारण सत्याग्रह गॉंधीजी के अहिंसा के साक्षात रुप में सिद्ध हुआ| सत्याग्रह का मूल लक्षण है, अन्याय का सर्वथा विरोध करते हुए अन्यायी के प्रति वैरभाव न रखना| भारत में गॉंधीजी के नेतृत्व में सत्याग्रह आंदोलन के अंतर्गत अनेक कार्यक्रम चलाए गये थे| जिनमें प्रमुख रुप से चम्पारण सत्याग्रह है| गॉंधीजी ने कहा था कि यह एक ऐसा आंदोलन है जो पूरी तरह सच्चाई पर कायम है और हिंसा का इसमें कोई स्थान नहीं है| यह आंदोलन ने लोगों में और कार्यकर्ताओं में एक नई चेतना का निर्माण किया था| ऐसा कहा जाता है कि सो साल से नील का दाग धोया नहीं जाता था, गॉंधीजी ने छह महीनों में धो डाला| उनकी पद्धति रचनात्मक कार्य की थी, उन्होंने लोगो को शिक्षित किया और लोगों में छिपे भय को निकाल ने में सफल रहे| चम्पारण सत्याग्रह की शताब्दी वर्ष के अंतर्गत प्रस्तुत है यह लेख| - सम्पादक

१० अप्रैल २०१७ को चम्पारण का सत्याग्रह १०० साल का हो गया है| चम्पारण भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास का खुलासा करता है| साम्राज्यवाद उत्पीड़न के विरूद्ध लड़ने के लिए गॉंधीजी ने एक प्रभावशाली कार्य प्रणाली विकसित किया, उन्होंने इसे सत्याग्रह के नाम से पुकारा| चम्पारण सत्याग्रह के परिणाम ने राजनीतिक स्वतंत्रता की अवधारणा और पहुंच को पुनर्भाषित किया और पूरे ब्रिटिश-भारतीय समीकरण को एक जीवंत मोड़ पर खड़ा कर दिया|

चम्पारण में ब्रिटिश बागान मालिकों ने जमींदारों की भूमिका अपना ली थी और वे न केवल वार्षिक उपज का ७० प्रतिशत भूमि कर वसूल कर रहे थे, बल्कि उन्होंने एक छोटे से मुआवजे के बदले किसानों को हर एक बीघा (२० कट्टे) जमीन के तीन कट्टे में नील की खेती करने के लिए मजबूर किया| उन्होंने कल्पना से बाहर अनेक बहानों के तहत गैर कानूनी उपकर ‘अबवाब’ भी लागू किया| यह कर विवाह में ‘मारवाच’, विधवा विवाह में ‘सागौरा’, दूध, तेल और अनाज की बिक्री में ‘बेचाई’ के नाम से जाना जाता था| उन्होंने प्रत्येक त्यौहार पर भी कर लागू किया था| अगर किसी बागान मालिक के पैर में पीड़ा हो जाए, तो वह इसके इलाज के लिए भी अपने लोगों पर ‘घवही’ कर लागू कर देता था|

बाबू राजेन्द्र प्रसाद ने ऐसे ४१ गैर कानूनी करों की सूची बनाई थी| जो किसान कर का भुगतान करने या नील की खेती करने में नाकाम रहते थे उन्हें शारीरिक दंड दिया जाता था| फरीदपुर के मजिस्ट्रेट रहे ई. डब्ल्यू.एल.टॉवर ने कहा था ‘नील की एक भी ऐसी चेस्ट इंग्लैंड नहीं पहुंची, जिस पर मानव रक्त के दाग न लगे हों, नील की खेती रक्तपात की एक प्रणाली बन गई थी| डर का बोलबाला था| ब्रिटिश बागान मालिक और उनके एजेंट आतंक के पर्याय थे|’

याचिकाओं और सरकार द्वारा नियुक्त समितियों के माध्यम से स्थिति को सुधारने के अनेक प्रयास किये गये, लेकिन कोई राहत नहीं मिली और स्थिति निराशाजनक ही रही| गॉंधीजी नील की खेती करने वाले एक किसान राजकुमार शुक्ला के अनुरोध पर चम्पारण का दौरा करने पर सहमत हो गए, ताकि वहां की स्थिति का स्वयं जायजा ले सकें| बागान मालिक, प्रशासन और पुलिस के बीच गठजोड़ के कारण एक आदेश बहुत जल्दी जारी किया गया कि गॉंधीजी की उपस्थिति से जिले में जन आक्रोश फैल रहा है, इसलिए उन्हें तुरंत जिला छोड़ना होगा या फिर दंडात्मक कार्रवाई का सामना करना होगा|

गॉंधीजी ने न केवल सरकार और जनता को इस आदेश की अवज्ञा करने की घोषणा करते हुए चौंका दिया, बल्कि यह इच्छा भी जाहिर की कि जब तक जनता चाहेगी वे चम्पारण में ही अपना घर बना कर रहेंगे| मोतिहारी जिला अदालत में मजिस्ट्रेट के सामने गॉंधीजी ने जो बयान दिया, उससे सरकार चकित हुई और जनता उत्साहित हुई थी| गॉंधीजी ने कहा था कि ‘कानून का पालन करने वाले एक नागरिक के नाते मेरी पहली यह प्रवृत्ति होगी कि मैं दिए गए आदेश का पालन करूं, लेकिन मैं जिनके लिए यहां आया हूं, उनके प्रति अपने कर्तव्य की हिंसा किये बिना मैं ऐसा नहीं कर सकता| आप मुझे जो सजा देना चाहते हैं, उसे कम कराने की भावना से मैं यह बयान नहीं दे रहा हूं्| मुझे तो यही जता देना है कि आज्ञा का अनादर करने में मेरा उद्देश्य कानून द्वारा स्थापित सरकार का अपमान करना नहीं है, बल्कि मेरा हृदय जिस अधिक बड़े कानून को अर्थात् अन्तरात्मा की आवाज को स्वीकार करता है, उसका अनुसरण करना ही मेरा उद्देश्य है| यह समाचार जंगल की आग की तरह फैल गया और अदालत के सामने अभूतपूर्व भीड़ इकट्ठी हो गई| बाद में गॉंधीजी ने इसके बारे में लिखा कि किसानों के साथ इस बैठक में मैं ईश्वर, अहिंसा और सत्य के प्रति आमने-सामने खड़ा था|’

अत्यंत विनम्रता, पारदर्शिता और दृढ्ढता से लोगों ने देखा कि उन्हें गॉंधी के रूप में एक उद्धारक मिल गया है| मजिस्ट्रेट ने मामले को खारिज कर दिया और कहा कि गॉंधीजी चम्पारण के गॉंवों में जाने के लिए आजाद हैं| यह घटना से प्रभावित हो कर सी. एफ. एंड्रयूज नामक एक अंग्रेज, जिन्हें लोग प्यार से ‘दीनबंधु’ कहते थे, गॉंधीजी की सहायता के लिए पहुंचे| पटना के बुद्धिजीवी बाबू ब्रज किशोर प्रसाद, बैरिस्टर मज़रुल हक, बाबू राजेंद्र प्रसाद तथा प्रोफेसर जे. बी. कृपलानी के नेतृत्व में युवाओं की अप्रत्याशित भीड़ के साथ गॉंधीजी की सहायता के लिए उनके चारों ओर इकट्ठे हो गए|

गॉंव की दयनीय हालत देखकर गॉंधीजी ने स्वयंसेवकों की सहायता से छह ग्रामीण स्कूल, ग्रामीण स्वास्थ्य केन्द्र, ग्रामीण स्वच्छता के लिए अभियान और नैतिक जीवन के लिए सामाजिक शिक्षा की शुरूआत की| देश भर के स्वयंसेवकों ने सौंपे जाने वाले कार्यों के लिए अपना नामांकन कराया| इन स्वंयसेवकों में भारत सेवक समाज के डॉ. देव भी थे| पटना के स्वयसेवकों ने आत्म निर्धारित श्रेष्ठता का परित्याग करके एक साथ रहना, साधारण भोजन खाना और किसानों के साथ भाई-चारे का व्यवहार करना शुरू कर दिया| उन्होंने खाना बनाना और बर्तन साफ करना भी शुरू कर दिया| पहली बार किसान अन्यायी प्लांटरों से परेशान होकर निडर रूप से अपनी परेशानियां दर्ज करवाने के लिए आगे आए| व्यवस्थित जांच मामले के तर्कसंगत अध्ययन और सभी पक्षों के मामले की शांतिपूर्ण सुनवाई, जिसमें ब्रिटिश प्लांटर्स भी शामिल थे तथा न्याय के लिए आह्वान के कारण सरकार ने एक जांच समिति का गठन करने के आदेश दिए| इस कमेटी में गॉंधीजी भी एक सदस्य थे, जिन्होंने आखिर में चम्पारण से तीन कठिया प्रणाली के पूर्ण उन्मूलन की अगवाई की|

चम्पारण से सबक - चम्पारण से नई जागृति आई और इसने यह दर्शाया है कि:

कोई प्रतिद्वंद्वी नहीं, बल्कि उसकी अन्यायपूर्ण व्यवस्था हमारी दुश्मन है|

क्रोध और घृणा की स्थिति में भी अहिंसा निडरता से रास्ता दिखाती है|

अन्यायपूर्ण कानून के साथ सभ्यता पूर्ण असहयोग और अपेक्षित दंड को प्रस्तुत करने तथा सच्चाई के अनुपालन की इच्छा ऐसे बल का सृजन करती है, जो किसी सत्तावादी ताकत को निस्तेज करने के लिए पर्याप्त है|

निडरता, आत्मनिर्भरता और श्रम की गरिमा स्वतंत्रता का मूल तत्व है

यहां तक कि शारीरिक रूप से कमजोर व्यक्ति भी चरित्र बल पर ताकतवर बनकर विरोधियों को परास्त कर सकता है|

स्वतंत्रता केवल राजनीतिक उत्पीड़न से बचने के लिए ही नहीं होती है| इसका ध्येय सभी चंगुल से मुक्ति पाना है; गरीबी से, निरक्षरता से, खराब स्वास्थ्य से और स्वच्छता की कमी से, उसके बाद जो प्राप्त होगा वह असली स्वराज होगा|

चम्पारण सत्याग्रह के बारे में बाबू राजेन्द्र प्रसाद ने लिखा है कि ‘राष्ट्र ने अपना पहला पाठ सीखा और सत्याग्रह का पहला आधुनिक उदाहरण प्राप्त किया|’

 

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