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News - भारत छोड़ो आंदोलन की ७५ वी वर्षगॉंठ

९ अगस्त १९४२ में महात्मा गॉंधी द्वारा भारत छोड़ो आंदोलन घोषित किया गया था| ९ अगस्त २०१७ को इस आंदोलन के पूरे ७५ साल हो गए हैं| यह एक ऐसा आंदोलन था जिसने ब्रिटिश हुकूमत को हिलाकर रख दिया था| गॉंधीजी के एक आह्वान पर पूरे देश में चेतना की लहर फैल गई थी, यह देश की स्वतंत्रता का अंतिम व्यापक आंदोलन बना|

इस विशेष अवसर पर गॉंधी रिसर्च फाउण्डेशन द्वारा दो कार्यक्रम को आयोजित किये गए| एक जलगॉंव स्थित महाविद्यालयों के छात्रों के साथ भारत छोड़ो आंदोलन के संदर्भ में संवाद कार्यक्रम किया, दूसरा गॉंधी तीर्थ पर भारत छोड़ो आंदोलन पर फाउण्डेशन के कार्यकर्ताओं द्वारा प्रस्तुति दी गई|

९ अगस्त २०१७ को जलगॉंव स्थित मू. जे. महाविद्यालय के इतिहास विभाग एवं गॉंधी रिसर्च फाउण्डेशन द्वारा ‘भारत छोड़ो’ आंदोलन की गरिमा और उसकी ऐतिहासिक धरोहर’ विषय पर संवाद कार्यक्रम आयोजित किया गया| उस कार्यक्रम में फाउण्डेशन के डीन डॉ. जॉन चेल्लदूरै एवं विनोद रापतवार मुख्य वक्ता के रूप में उपस्थित थे| डॉ. जॉन ने भारत छोड़ो आंदोलन के ऐतिहासिक संदर्भ को दर्शाते हुए द्वितीय विश्व युद्ध में ब्रिटेन की स्थिति एवं गॉंधीजी का निर्णय के संदर्भ में अपनी बात रखी| उन्होंने कहा कि भारत छोड़ो आंदोलन केवल भारत के लिए ही नहीं बल्कि एशिया के लिए भी एक महत्त्वपूर्ण नारा बन गया था| विनोद रापतवार ने अपनी प्रस्तुति में छात्रों को संवेदनात्मक नजरिया प्रस्तुत करते हुए कहा कि हम अपने इतिहास को कैसे देखते हैं, यह बड़ा सवाल बन गया है| केवल यह एक घटना नहीं किन्तु हमारे पूर्वजों द्वारा स्थापित बुनियाद की नींव है, उनके बलिदानों की बदौलत आज हम सुरक्षित हैं| और यह आंदोलन भारत निर्माण के लिए भी एक महत्वपूर्ण घटक साबित हुआ|

इस कार्यक्रम में मू. जे महाविद्यालय के प्राचार्य डॉ. उदय कुलकर्णी, इतिहास विभाग के अध्यक्ष डॉ. इंगले एवं छात्र-छात्राएं उपस्थित थे| इसी कार्यक्रम की अगली श्रृंखला ११ अगस्त को रायसोनी पोलिटेकनीक कॉलेज में आयोजित की गई थी| रायसोनी कॉलेज के प्राचार्य डॉ. प्रीति अग्रवाल एवं छात्र-छात्राएं उपस्थित थे|

गॉंधी तीर्थ पर भारत छोड़ो आंदोलन पर प्रस्तुतिः

फाउण्डेशन के प्रांगण में विशेष दिन के अंतर्गत कई कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं| भारत छोड़ो आंदोलन की ७५ वीं जयंती के संदर्भ में फाउण्डेशन के कई कार्यकर्ताओं द्वारा विशेष प्रस्तुति की गई| उनमें

जॉन चेल्लदूरै ने भारत छोड़ो आंदोलन के ऐतिहासिक संदर्भ को प्रस्तुत करते हुए कहा कि ८ अगस्त, १९४२ को पारित ‘भारत छोड़ो’ संकल्प से भारत के स्वतंत्रता संग्राम में एक निर्णायक मोड़ की शुरुआत हुई| साथ साथ गॉंधीजी ने कांग्रेस का नेतृत्व करते हुए महत्त्वपूर्ण निर्णय लेकर धुरी राष्ट्रों के मनसूबे पर पानी फेर दिया था| अनिलेष जगदाले ने अपनी बात रखते हुए भारत छोड़ो का नारा क्यों दिया गया इस विषय पर प्रकाश डाला| सीमा तडवी ने इस विषय पर प्रकाश डालते हुए कहा कि काकोरी कांड स्मृति-दिवस मनाने की परंपरा भगत सिंह ने प्रारंभ कर दी थी और इस दिन बहुत बड़ी संख्या में नौजवान एकत्र होते थे| संभवत: यही वजह से भारत छोड़ो आंदोलन के लिए गॉंधीजी ने ९ अगस्त १९४२ का दिन चुना होगा| भुजंगराव बोबडे ने भारत छोड़ो आंदोलन का असर वर्तमान में क्या है, इस बात को रखते

हुए कहा कि आज भी हमारे देश में न जाने कितने सामाजिक समस्याएं हैं इनको दूर करके हमारे देश-बंधुओं के लिए एक सुनिश्चित जीवन निर्माण करना ही सच्ची आजादी मानी जाएगी| अगर आज के दौर में कुछ छोड़ना ही है तो सामाजिक बुराइयों को छोड़ना है| अश्विन झाला ने ‘करेंगे या मरेंगे’ इस नारे का निर्माण करने के पीछे महात्मा गॉंधी के विचार प्रस्तुत किए|

 




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